What is Hamsa Rajyog (हंस राजयोग) benefits and how to calculate

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Formation of Hamsa Rajyog
Hamsa Yoga forms with the divine Jupiter, when it occupies Kendra houses together with if it occupies signs – Cancer, Sagittarius or Pisces, then this gives the arise of Hamsa Yoga.
Jupiter signifies, wealth, expansion, education, guru, wisdom, learning, happiness, elegance, knowledge. Native with Hamsa Yoga are sweet voice, attractive courageous, honest, trust worthy, educated, virtuous and enjoys all types of material comforts and sensual desires.


Cancellation of Maha Purush Yoga
As per classical texts Mansagri, chapter 13, says The conjunction of the Yoga creating planets if conjoins with the Sun or Moon then Yoga gets nullified or becomes ineffective. Whereas there are some more other factors which gives cancellation of Mahapurusha Yoga, which are as follows:
Moon is in 6/8 position fromJupiter.Close contact with the Mercury/Rahu.Mutual aspect with the Mars. Jupiter is combust or Retro. If Yoga giving planet is combust or weak. If it is aspected by it’s deb…

ग्रहों की विभिन्न अवस्थाएं

ग्रहों  की  विभिन्न  अवस्थाएं
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मित्रों  किसी  भी कुंडली  का  अध्ययन  करते समय  हमे   इस  बात  का  विशेष  ध्यान  रखना  पड़ता  है  की  ग्रहों  की अवस्था  कैसी  है  जिस  से  हम उनके  फल  का  अनुमान  लगा सकते है ।
ग्रहों की दिप्तादि अवस्थाएँ
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1. दीप्त- जो ग्रह अपनी उंच या मूलत्रिकोण राशि में हो दीप्त अवस्था का कहलाता है। उत्तम फल देता है।
2. स्वस्थ- जो ग्रह अपनी ही राशि में हो स्वस्थ कहलाता है शुभफलदायी होता है।
3. मुदित- जो ग्रह अपने मित्र या अधिमित्र की राशि में हो मुदितवस्था का ग्रह होता है और शुभफलदायी होता है।
4.शांत- जो ग्रह किसी शुभ ग्रह के वर्ग में हो वो शांत कहलाता है और शुभ फल प्रदान करता है।
5. गर्वित- उच्च मूलत्रिकोण राशि का ग्रह गर्वित अवस्था में होता है उत्तम फल दायी होता है।
6. पीड़ित - जो ग्रह अन्य पाप ग्रह से ग्रस्त हो पीड़ित कहलाता है और अशुभफलप्रदान करता है।
7. दीन- नीच या शत्रु की राशि में दीन अवस्था का होता है अशुभफलदायि होता है।
8. खल- पाप ग्रह की राशि में गया हुवा ग्रह खल कहलाता है और अशुभ फलदायी होता है।
9. भीत- नीच राशि का ग्रह भीत अवस्था का होता है और अशुभफलदायि होता है।
10.विकल - अस्त हुवा ग्रह विकल कहलाता है शुभ होते हुवे भी फल प्रदान नही कर पाता।
मित्रों इस प्रकार ये ग्रह की अवस्था हुई जिनसे आप पता लगा सकते हो की कोई ग्रह आपको कितना और कैसा फल देगा ।ग्रहों की लज्जितादि 6 अवस्थाएं
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1. लज्जित - जो ग्रह पंचम भाव में राहु केतु सूर्य शनि या मंगल से युक्त हो वह लज्जित कहलाता है जिसके प्रभाव स पुत्र सुख में कमी और व्यर्थ की यात्रा और धन का नाश होता है।
2. गर्वित- जो ग्रह उच्च स्थान या अपनी मूलत्रिकोण राशि में होता है गर्वित कहलाता है। ऐसा ग्रह उत्तम फल प्रदान करता है और सुख सोभाग्य में विर्धि करता है।
3. क्षुधित - शत्रु के घर में या शत्रु से युक्त क्षुधित कहलाता है अशुभ फलदायी कहलाता है।
4. तृषित -जो ग्रह जल राशि में सिथत होकर केवल शत्रु या पाप ग्रह से द्रिस्ट  हो तृषित कहलाता है। इस से कुकर्म में बढ़ोतरी बंधू विवाद दुर्बलता दुस्ट द्वारा क्लेश परिवार में चिन्ता धन हानि स्त्रियों को रोग आदि अशुभ फल मिलते है।
5.मुदित- मित्र के घर में मित्र ग्रह से युक्त या द्रिस्ट  मुदित कहलाता है शुभफलदायी होता है।
6.छोभित- सूर्य के साथ सिथत होकर केवल पाप ग्रह से दीर्स्ट होने पर ग्रह छोभित कहलाता है।
जिन जिन भावों में तृषित क्षुधित या छोभित ग्रह होते है उस भाव के सुख की हानि करते है।
ग्रहों की जागृत आदि अवस्थाएं
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मित्रों ग्रहों की तिन अवस्था होती है 1. जागृत 2. स्वप्न और तीसरी सुषुप्ति अवस्था।
प्रत्येक राशि को 10 10 के तिन अंशो में बांटे। विषम राशि यानी पहली ,तीसरी ,पाँचमि ,सातवीं ,नोवी और ग्यारवीं के पहले भाग यानी एक से दस अंश तक कोई ग्रह हो तो वो जागृत अवस्था में होगा, 10 से 20 तक स्वप्न और 20 से 30 अंश तक हो तो सुषुप्ति अवस्था में होगा।
इसके विपरीत सम राशि यानी दूसरी ,चौथी ,छटी, आठवीं ,दसवीं और बारवीं में यदि कोई ग्रह 1 से 10 अंश तक का हो तो सुषुप्ति अवस्था में ,11 से 20 तक में स्वप्न अवस्था और 20 से 30 तक जागृत अवस्था में होगा । ग्रह की जागृत अवस्था जातक को सुख प्रदान करती है और ग्रह पूर्ण फल देने में सक्षम होता है । स्वप्न अवस्था का ग्रह मध्यम फल देता है और सुषुप्ति अवस्था का ग्रह फल देने में निष्फलि माना जाता है।
जय  श्री   राम

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