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Showing posts from May, 2018

Bhadra Panch Mahapurush Yog in Kundli

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Bhadra Pancha Mahapurush Yogas

Pancha Mahapurush Yoga meaning – Five great men, it is a five different group and Mars, Mercury, Jupiter, Venus and Saturn gives the formation of this prosperity and luck giving Yoga, these planets represents five sense – Smell, sight, hearing, taste, touch. The formation of this luck enhancing Yoga in a horoscope of a native gives, name-fame, prosperity, success. Similarly, the relationship between the planets, and lords of two houses and if the planets are posited in the particular positions then native gains immense success, prosperity in life.
The number of the Yoga are as follows:
1. Ruchak Yoga
2. Bhadra Yoga
3. Hamsa Yoga
4. Malavya Yoga
5. Sasa Yoga

Here we are going to learn 2. Bhadra Yoga out of 5 Yogas.
If Mercury occupies Kendra houses and occupies Gemini or Virgo sign then Bhadra Yoga Forms.
This yoga confer with the Mercury, as Bhadra Yoga manifest the qualities of Mercury and Mercury is a planet of speech, communication, mathematics, intelligence…

जन्म कुंडली अध्ययन से रोग का पता लगाना

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जन्म कुंडली अध्ययन से रोग का पता लगाना

जन्म पत्रिका का अष्टम भाव वैसे तो मोक्ष का स्थान माना जाता है। परंतु यह बिमारी का भी घर है। कुछ योग ऐसे हं जो अष्टम स्थान में प्रभावशील होकर रोग उत्पन्न करते हैं। कौन से हैं वे रोग आइए जानते हैं।
1 अष्टम भाव मंगल, चंद्र और शुक्र हो तो जातक सेक्स संबधी एवं हर्निया रोग से ग्रसित होता है।
2 अष्टम भाव में शुक्र हो तथा प्रथम भाव में शनि हो तो पेंशाब में घात संबधी रोग होता है। शनि यदि अष्टम भाव में हो उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि ना हो तो भी पेशाब संबधी रोग होता है।
3 अष्टम भाव में मंगल, शुक्र की युति हो तो वीर्य संबंधी रोग होता है।
4 अष्टम भाव में शनि हो तथा उस पर मंगल की दृष्टि हो तो जलोदर नाम का रोग होता है।
5 मोक्ष स्थान अष्टम में केतु अशुभ होने पर वायु गोला रोग करता है, केतु पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो अल्सर भी हो सकता है।
6 अष्टम स्थान पर चंद्रमा नीच का हो, शत्रु या अशुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो सर्दी संबधी रोग होते हैं। हर्निया, गैस, हृदय रोग भी हो सकता है।
7 अष्टम स्थान पर नीच का मंगल राहु से युक्त हो, चंद्र कमजोर हो तो बाढ़ में बहने या जल में डूबने …
सप्ताहिक वार के अनुसार जन्म से जीवन का आधारभूत व्याख्यान* रविवार -
रविवार के दिन जन्म लेने वाले बालक की प्रकृति तेज होती है। यह चतुर, दान करने वाला  समूह का नेतृत्व करने वाला आदेशात्मक वाणी बोलने वाला होता है। पित्त की बीमारी के रोग लगते है। इसे 1, 6 महीने में तथा 13, 23 वें वर्ष में कष्ट होता है तथा पूर्णायु 50 वर्ष होती है।
* सोमवार-
इस दिन जन्म लेने वाले बालक की प्रकृति शांत होती है। यह सुख-दुःख दोनों में सामान भाव से रहने वाला, चतुर , बुद्धिमान तथा धैर्यवान होता है । राजकीय नौकरी करने वाला होता है अर्थात राज्य कर्मचारी होता है। इसे 8,11 वें महीने तथा 16, 27 वें वर्ष में कष्ट होता है तथा पूर्णायु 84 वर्ष की होती है।
* मंगलवार-  इस दिन जन्मने वाले बालक की प्रकृति गर्म होती है। यह पराक्रमी, वीर, साहसी एवं संग्राम में  विजय प्राप्त करने वाला होता है। इसकी बुद्धि विशेष अच्छी नहीं होती, इसी से यह बौद्धिक  कार्यों से अलग रहना पसंद करता है, परन्तु वीरता के कार्यों में आगे बढ़ने वाला होता है। इसे 2, 32 वें वर्ष में कष्ट होता है तथा पूर्णायु 74 वर्ष की होती है। * बुधवार-
इस दिन जन्म लेने वाले बालक…

तांत्रिक जड़ीबूटियां वनस्पति तन्त्र

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वनस्पति तन्त्र तांत्रिक जड़ीबूटियांसफ़ेद सरसों मित्रों,
  तंत्र ग्रन्थों , या तंत्र सम्बन्धी पुस्तकों और उपायों में कई जगह सफ़ेद सरसों का उल्लेख्य सामने आता है। किंतु जब व्यक्ति इसकी खोज करते हुए पंसारी या जड़ी बूटी बेचने वाले दुकानदार के पास जाता है तो वो उसे वही पीली सरसों थमा देते हैं या कहते हैं कि एक काली होती है दूसरी सफ़ेद , सफ़ेद मतलब पीली। और इसी प्रकार वो लोगों को गुमराह कर देते हैं और उचित वस्तु न् मिलने पर जब व्यक्ति का काम पूर्ण नहीं होता तो वो तन्त्र विद्या को और करने वाले तांत्रिक या आचार्य आदि को झूठा बताते हैं।
मित्रों, सफ़ेद सरसों पीली सरसों के मुकाबले काफी दुर्लभ होती है। ये बिलकुल सफ़ेद नहीँ होती बल्कि हल्की पीली होती है और पीली सरसों के साथ रख के तुलना करने पर अपेक्षाकृत सफ़ेद पाई जाती है। कभी कभी सरसों के पौधे में जैविक बदलावों से भी सफ़ेद सरसो पैदा होती है। सफ़ेद सरसों के कुछ प्रयोग 1.कार्य सिद्धि गणपति प्रयोग कृष्ण पक्ष चतुर्थी से शुक्ल पक्ष चतुर्थी तक प्रतिदिन भगवान गणपति का अभिषेक एवम तर्पण कर श्वेत तिल, श्वेत सरसों , गुड़ और घी से 108 आहुति दी जाएं तो सर्वकार्य सिद्धि होती है।

कारकांश जैमिनी ज्योतिष पद्धति

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जैमिनी ज्योतिष पद्धति : जैमिनी पद्धति के अनुसार व्यवसाय चयन हेतु कारकांश महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। (कारकांश आत्म कारक का नवमांश है) यदि कारकांश या उससे दसवां किसी ग्रह से युक्त न हो तो कारकांश से दशमेश की नवमांश में स्थिति से व्यवसाय ज्ञात किया जाता है।
1) कारकांश में सूर्य राजकीय सेवा देता है और राजनैतिक नेतृत्व देता है।
2) पूर्ण चंद्र व शुक्र कारकांश में लेखक व उपदेशक बनाता है।
3) कारकांश में बुध व्यापारी तथा कलाकार का योग प्रदान करता है।
4) बृहस्पति कारकांश में जातक को धार्मिक विषयों का गूढ़ विद्वान व दार्शनिक बनाता है।
5) कारकांश में शुक्र जातक को सरकारी अधिकारी शासक व लेखक बनाता है।
6) कारकांश में शनि जातक को विख्यात व्यापारी बनाता है।
7) कारकांश यदि राहु हो तो मशीन निर्माण कार्य, ठगी का कार्य करने वाला जातक को बना देता है।
8) कारकांश का केतु से संबंध हो तो जातक नीच कर्म तथा धोखाधड़ी से आजीविका कमाता है।
9) कारकांश यदि गुलिक की राशि हो और चंद्र से दृष्ट हो तो व्यक्ति अपने त्यागपूर्ण व्यवहार से और धार्मिक कार्यों से जीविका अर्जित करेगा।
10) कारकांश में यदि केतु हो और शुक्र से दृष्ट हो तो धा…

गोमती चक्र चमत्कारिक खोज

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गोमती चक्र कम कीमत वाला एक ऐसा पत्थर है जो गोमती नदी में मिलता है। विभिन्न तांत्रिक कार्यों तथा असाध्य रोगों में इसका प्रयोग होता है। इसका तांत्रिक उपयोग बहुत ही सरल होता है। किसी भी प्रकार की समस्या के निदान के लिए यह बहुत ही कारगर उपाय है।
गोमती चक्र की पूजा -
होली, दिवाली और नवरात्रि जैसे अवसरों पर गोमती चक्र की विशेष पूजा होती है। सर्वसिद्धि योग, अमृत योग और रविपुष्य योग आदि विभिन्न मुहूर्तों पर भी गोमती-चक्र की पूजा की जा सकती है।
* असाध्य रोगों को दुर करने तथा मानसिक शान्ति प्राप्त करने के लिये लगभग 10 गोमती चक्र लेकर रात को पानी में डाल देना चाहिऐ। सुबह उस पानी को पी जाना चाहिऐ। इससे पेट संबंध के विभिन्न रोग दुर होते है।
* धन लाभ के लिऐ 11 गोमती चक्र अपने पुजा स्थान मे रखना चाहिऐ उनके सामने
'ॐ श्रियै नमः' का जाप करना चाहिऐ। इससे आप जो भी कार्य करेंगे उसमे आपका मन लगेगा और सफलता प्राप्त होगी । किसी भी कार्य को उत्साह के साथ करने की प्रेरणा मिलेगी।
* गोमती चक्रों को यदि चांदी अथवा किसी अन्य धातु की डिब्बी में सिंदुर तथा अक्षत डालकर रखें तो ये आर्थिक दृष्टि से शीघ्र फलदायक होते …

ह्रदय रोग

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ह्रदय रोग  >> आज कल के खान पान रेहान सहन और दैनिक दिनचर्या के अस्त व्यस्त होने के कारण ह्रदय रोग की समस्या आम बात हो गई है
>> ह्रदय के करक गृह 
>> सूर्य ह्रदय करक गृह है
>> बुद्ध धमनियों का करक गृह है
>> गुरु वासा का करक गृह है
>> शनि और राहु धमनियों में रूखा पन व विकृति का गृह है
>> मंगल रक्त मांसपेशी का करक गृह है
>> चंद्र रक्त के सही भहाव का करक गृह है ब्लड प्रेशर इत्यादि 
>> लग्न स्वयं को दर्शाता है चतुर्थ भाव कालपुरुष कुंडली के ह्रदय का भाव है जो की हमारी छाती का भाग होता षष्ट भाव रोग को अष्टम भाव लंबे चलने वाले रोग को और द्वादश भाव हॉस्पिटल को चतुर्थ भाव को  और कारक गृह जब भी पीढित होंगे ह्रदय रोग की गणना की जा सकती है .चतुर्थ भाव भावेश पर पाप प्रभाव शनि राहु केतु इत्यादि या चथुर्थेश का संभंध 6,8,12 भाव से होगा और साथ में करक ग्रहों पर पाप प्रभाव होगा तो ह्रदय रोग होगा
>> ह्रदय रोग के प्रकार
>> धमनियों में ब्लॉकेज या अवरोध- गुरु ग्रह वसा के कारक है गुरु ग्रह का 6,8,12 भाव भावेशों से सम्बन्ध चतुर्थ भाव चतुर्थेश का पीड़ित होने …

अपने लग्न से जानिए विदेश यात्रा के योग

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Foreign yoga: अपने लग्न से जानिए विदेश यात्रा के योग
आजकल पूरी दुनिया एक ग्लोबल विलेज बन चुकी है। न केवल जॉब के लिए बल्कि पर्यटन के लिहाज से भी लोग खूब विदेश यात्राएं करने लगे हैं। लेकिन कई लोग चाहते हुए भी विदेश नहीं जा पाते, इसका कारण आपकी जन्म कुंडली में छुपा हुआ है। कौन व्यक्ति जीवन की किस अवस्था में विदेश यात्रा करेगा यह जन्म कुंडली में लिखा हुआ है, बस जरूरत है उसका सही-सही विश्लेषण करने की। ज्योतिष के अनुसार किसी भी कुंडली के अष्टम भाव, नवम, सप्तम, बारहवां भाव विदेश यात्रा से संबंधित होते हैं, जिनके आधार पर पता लगाया जा सकता है कि कब विदेश यात्रा का योग बन रहा है। इसी तरह से जन्मकुंडली के तृतीय भाव से भी यात्राओं की जानकारी हासिल की जा सकती है। कुंडली में अष्टम भाव समुद्री यात्रा का प्रतीक होता है और सप्तम तथा नवम भाव लंबी विदेश यात्राओं या विदेशों में व्यापार, व्यवसाय एवं दीर्घ प्रवास का संकेत करता है।
आइए जानते हैं लग्न के अनुसार विदेश यात्रा के योग
मेष लग्न में शनि अष्टम भाव में स्थित हो तो... मेष लग्न में शनि अष्टम भाव में स्थित हो तथा द्वादश भाव का स्वामी बलवान हो तो जातक कई ब…

Medical Astrology and diseases

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Life is beset with good and bad, health
and disease. No living being is free from health problem at one time or other. Medical science can diagnose the disease only when it occurs. Prevention from diseases, like the communicable and epidemic diseases, is possible by taking preventive measures in time. It is only astrology, numerology (not name numerology, which is not a science) and palmistry that can warn about a pending disease. The life of living creatures, particularly that of humans, is governed by the planetary influences, which can be read from the horoscope and Gochara.

The effect of planets on each sign, house and on each other plays an important role on the health in general and on particular organs. This effect will be felt during particular Dasa Vidasa (periods, sub-periods) of concerned planets. Some chronic or permanent disabilities occur in accordance with the placement of malefic planets in certain positions. Occasional physical disabilities and disturbances occur du…

Wealth

GENERAL INDICATIONS:  
According to Ptolemy, material wealth is judged only by the Part of Fortune. Its dispositor and the relationship between them determines the degree of wealth, as does the aspects of the planets to these places. If they are essentially dignified, favourably aspected and well placed, the native will be rich - particularly if aided by the aspects of the luminaries. 

According to Lilly, the principal significators for wealth in the nativity are: 

the sign on the 2nd house cusp and its ruler;
the ruler of any intercepted sign in the 2nd;
the Part of Fortune and its dispositor;
Jupiter, a general significator for wealth;
Any planets located in the 2nd house.

Saturn, as the significator of wealth, indicates gain from agriculture, all forms of mining, property, shipping, buried treasure, antiques, lead, leather, things made of bone, and inheritance from parents. 

Jupiter signifies gain from trustees, guardianships, benefices, religion, government, law, banking and tin. 

Mars sign…

First house in Astrology

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Main Rulerships:  Life, vitality and health. Stature, colour, complexion, form and shape of body. Older sources note its influence upon the intellect, the way the mind works, and speech.  In general, the first house represents the focal point for the personality and manner of expression. As well as describing the physical appearance, the condition of this house and that of its planetary ruler indicates the level of personal vitality and strength. 

In Horary Astrology: The querent in any question. If a question is asked regarding a mundane situation in which the querent is not personally involved but has a strong sympathy and inclination, then use the 1st house to represent the party the querent favours and supports. In questions regarding war, for example, the 1st house signifies the querent's own country, since they identify with the concerns of their country when the question is expressed. 

In Mundane Astrology: The common people or general state of the nation. The country and its inh…

Brief introduction of vastu shastra

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Since the ancient times, the earth is called as “Vasudha” meaning the inhabitation of creatures. Not only but various creatures and organisms strive towards making a place suitable for their living. In this field, human consciousness and wisdom have evolved gradually with the help of experiences. Because of this, man has been successful in making his residence more comfortable with his intellectual skills. Though food, clothing, and house are the most important needs of humans without which it is not possible to sustain his life. As per a mythological story, a process of leveling the earth was adopted to make earth more suitable for living by a king named Prithu. It is almost impossible to enjoy the household comforts under an open sky. To fulfill the residential needs, Vastu Shastra came into existence. Among the Vedic scriptures, Rigveda is one of its kind which has the description of religious and residential buildings. Although Vastu has been utilized in the ancient times for mak…

EFFECTS OF REMEDIES

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https://youtu.be/kvvyek1HJcw Remedies and Useful Tips 
are the divine
tools mentioned in Vedic Horoscope Astrology There are several kinds of remedies that are used to get over the malefic impacts of planets and to make use of the positive times. Depending on the combination of planets and the afflictions therein the remedial measures also vary. They vary also from place to place, to suit the faith and belief of people concerned. Every planet is linked with a Gemstone, both precious and semi-precious, depending upon the intensity of the problem. Proper use of these Gemstones, make a direct impact on the planets. Thereby we are empowered by the positives and add strength to our persona while the malefic impacts are reduced. There are Rudrakshas, Yantras and the Mantras that work to provide effective solutions. Puja and Archana related to the specific deities of planets also make an impact on the planets. In all such ways, one tries to appease the positive strength of ruling planets and red…

कुण्डली के अशुभ योगों की शान्ति

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कुण्डली के अशुभ योगों की शान्ति

1).चांडाल योग=गुरु के साथ राहु या केतु हो तो जातकको चांडाल दोष है 2).सूर्य ग्रहण योग=सूर्य के साथ राहु या केतु हो तो 3). चंद्र ग्रहण योग=चंद्र के साथ राहु या केतु हो तो 4).श्रापित योग -शनि के साथ राहु हो तो दरिद्री योग होता है 5).पितृदोष- यदि जातक को 2,5,9 भाव में राहु केतु या शनि है तो जातक पितृदोष से पीड़ित है. 6).नागदोष - यदि जातक को 5 भाव में राहु बिराजमान है तो जातक पितृदोष के साथ साथ नागदोष भी है. 7).ज्वलन योग- सूर्य के साथ मंगल की युति हो तो जातक ज्वलन योग(अंगारक योग) से पीड़ित होता है 8).अंगारक योग- मंगल के साथ राहु या केतु बिराजमान हो तो जातक अंगारक योग से पीड़ित होता है. 9).सूर्य के साथ चंद्र हो तो जातक अमावस्या का जना है 10).शनि के साथ बुध = प्रेत दोष. 11).शनि के साथ केतु = पिशाच योग. 12).केमद्रुम योग- चंद्र के साथ कोई ग्रह ना हो एवम् आगे पीछे के भाव में भी कोई ग्रह न हो तथा किसी भी ग्रह की दृष्टि चंद्र पर ना हो तब वह जातक केमद्रुम योग से पीड़ित होता है तथा जीवन में बोहोत ज्यादा परिश्रम अकेले ही करना पड़ता है. 13).शनि + चंद्र=विषयोग शान्ति करें 14).एक नक्षत्र ज…

संतान प्राप्ति के अचूक उपाय

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संतान प्राप्ति के अचूक उपाय
यदि किसी व्यक्ति को संतान प्राप्ति में समस्या आ रही हो, तो ऐसे व्यक्ति इस लेख में लिखे गये सरल उपायों को अपना कर संतान की प्राप्ति अति ही सहजता के साथ कर सकते हैं। किंतु उपायों को अति सावधानी से व श्रद्धा के साथ करना अति आवश्यक होता है। उपाय निम्नवत हैं: मार्गदर्शक की सलाह अवश्य लें । 1. संतान प्राप्ति के लिए पति-पत्नी दोनों को रामेश्वरम् की यात्रा करनी चाहिए तथा वहां सर्प-पूजन करवाना चाहिए। इस कार्य को करने से संतान-दोष समाप्त होता है। 2. स्त्री में कमी के कारण संतान होने में बाधा आ रही हो, तो लाल गाय व बछड़े की सेवा करनी चाहिए। लाल या भूरा कुत्ता पालना भी शुभ रहता है। 3. यदि विवाह के दस या बारह वर्ष बाद भी संतान न हो, तो मदार की जड़ को शुक्रवार को उखाड़ लें। उसे कमर में बांधने से स्त्री अवश्य ही गर्भवती हो जाएगी। 4. जब गर्भ धारण हो गया हो, तो चांदी की एक बांसुरी बनाकर राधा-कृष्ण के मंदिर में पति-पत्नी दोनों गुरुवार के दिन चढ़ायें तो गर्भपात का भय/खतरा नहीं होता। 5. यदि बार-बार गर्भपात होता है, तो शुक्रवार के दिन एक गोमती चक्र लाल वस्त्र में सिलकर गर्भवती महिला के क…

तिथि क्षय और वृद्धि

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तिथि क्षय और वृद्धि 
तिथियों का निर्धारण चन्द्रमा की कलाओं के आधार पर होता है। ये तिथियाँ चन्द्रमा की 16 कलाओं के आधार पर 16 प्रकारों में ही हैं। इसमें शुक्ल व कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से चतुर्दशी पर्यन्त 14-14 तिथियाँ तथा पूर्णिमा व अमावस्या सहित तीस तिथियों को मिलाकर एक चान्द्रमास का निर्माण होता है। शुक्ल पक्ष की 15वीं तिथि पूर्णिमा एवं कृष्ण पक्ष की 15वीं तिथि अमावस्या होती है।
एक तिथि का भोग काल सामान्यतया 60 घटी का होता है। किसी तिथि का क्षय या वृद्धि होना सूर्योदय पर निर्भर करता है। कोई तिथि, सूर्योदय से पूर्व आरंभ हो जाती है और अगले सूर्योदय के बाद तक रहती है तो उस तिथि की वृद्धि हो जाती है अर्थात् वह वृद्धि तिथि कहलाती है लेकिन यदि कोई तिथि सूर्योदय के बाद आरंभ हो और अगले सूर्योदय से पूर्व ही समाप्त हो जाती है तो उस तिथि का क्षय हो जाता है अर्थात् वह क्षय तिथि कहलाती है।
तिथि क्यों घटती-बढ़ती है ? तिथियों का निर्धारण सूर्य और चन्द्रमा की परस्पर गतियों के आधार पर होता है। राशि चक्र में 3600 होते हैं साथ ही तिथियों की संख्या 30 हैं अत: एक तिथि का मान।
360/ 30 = 120 = 1 तिथि
इसका तात्प…

श्वेतार्क (सफेद आक) चमत्कारी पौधा

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श्वेतार्क (सफेद आक) 

माना जाता है कि आंकड़े के पौधे में भगवान गणेश का वास होता है. इसलिए इसकी जड़ शुभ और पवित्र होकर श्री यानी, सुख-समृद्धि देने वाली मानी जाती है.  तंत्र क्रियाओं में सफेद आंकड़ा की जड़ से निर्मित श्रीगणेश का विशेष महत्व है.  इसे श्वेतार्क गणपति भी कहते हैं. कई टोने-टोटकों में श्रीगणेश के इस स्वरूप का उपयोग किया जाता है. श्वेतार्क गणपति को घर में स्थापित कर विधि-विधान से पूजा करने पर घर में किसी ऊपरी बाधा का असर नहीं होता. 🌹 सफेद आक के फूलों से शिव पूजन करें, भोले बाबा की कृपा होगी.   🌹 आक की जड़ रविपुष्य नक्षत्र में लाल कपड़े में लपेटकर घर में रख लें, घर में सुख-शांति तथा समृद्धि बनी रहेगी.   🌹 श्वेतार्क वृक्ष के नीचे बैठकर प्रतिदिन 'ऊँ गं गणपतये नमः' की एक माला जप करें, हर क्षेत्र में लाभ मिलेगा.   🌹 श्वेतार्क की जड़, गोरोचन तथा गोघृत में घिसकर तिलक किया करें, वशीकरण तथा सम्मोहन में इससे त्वरित फल मिलेगा. 🌹 श्वेतार्क से गणपति की प्रतिमा बनाकर घर में स्थापित करें. नित्य एक दूर्वाघास अर्पण कर श्रद्धापूर्वक गणपति जी का ध्यान किया करें, प्रत्येक कार्य में सफलता मिले…

भद्रा विचार

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माना जाता है कि भद्रा स्वर्ग लोक, पाताल लोक तथा पृथ्वी लोक में रहकर वहां के लोगों को सुख-दुःख का अनुभव कराती है। पंचांगों के अनुसार भद्रा में कोई भी मंगल कार्य करना निषिद्ध माना जाता है अन्यथा इसके करने से अनिष्ट होने की संभावना रहती है।
ज्योतिष शास्त्र में तिथि, वार, नक्षत्र, योग तथा करण के स्पष्ट मान आदि को पंचांग कहा जाता है। कोई भी मंगल कार्य करने से पहले पंचांग का अध्ययन करके शुभ मुहूर्त निकाला जाता है, परंतु पंचांग में कुछ समय या अवधि ऐसी भी होती है जिसमें कोई भी मंगल कार्य करना निषिद्ध माना जाता है अन्यथा इसके करने से अनिष्ट होने की संभावना रहती है। ऐसा ही निषिद्ध समय है "भद्रा"। भगवान सूर्य और उनकी पत्नी छाया से उत्पन्न भद्रा शनि देव की सगी बहिन हैं। विश्वकर्मा के पुत्र विश्वस्वरूप भद्रा के पति हैं।
भद्रा के बारह नाम हैं -धन्या, दधिमुखी, कुलपुत्रिका, भैरवी, महाकाली, असुराणा, महामारी, विष्टि, खरानना, कालरात्रि, महारुद्र और क्षयंकरी। भद्रा का स्वरुप भद्रा का स्वरुप अत्यंत विकराल बताया गया है। इनका रंग काला, केश लंबे और दांत बड़े-बड़े हैं। ब्रह्मा जी के आदेश से भद्रा, काल क…

जन्मपूर्व योनि विचार

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जन्मपूर्व योनि विचार
1- जिस व्यक्ति की कुंडली में चार या इससे अधिक ग्रह उच्च राशि के अथवा स्वराशि के हों तो उस व्यक्ति ने उत्तम योनि भोगकर यहां जन्म लिया है, ऐसा ज्योतिषियों का मानना है। 2- लग्न में उच्च राशि का चंद्रमा हो तो ऐसा व्यक्ति पूर्वजन्म में योग्य वणिक था, ऐसा मानना चाहिए। 3- लग्नस्थ गुरु इस बात का सूचक है कि जन्म लेने वाला पूर्वजन्म में वेदपाठी ब्राह्मण था। यदि
जन्मकुंडली में कहीं भी उच्च का गुरु होकर लग्न को देख रहा हो तो बालक पूर्वजन्म में
धर्मात्मा, सद्गुणी एवं विवेकशील साधु
अथवा तपस्वी था, ऐसा मानना चाहिए।
4- यदि जन्म कुंडली में सूर्य छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो अथवा तुला राशि का हो तो व्यक्ति पूर्वजन्म में भ्रष्ट जीवन व्यतीत करना वाला था, ऐसा मानना चाहिए। 5- लग्न या सप्तम भाव में यदि शुक्र हो तो जातक पूर्वजन्म में राजा अथवा सेठ था व जीवन के सभी
सुख भोगने वाला था, ऐसा समझना चाहिए।
6- लग्न, एकादश, सप्तम या चौथे भाव में शनि इस बात का सूचक है कि व्यक्ति पूर्वजन्म में शुद्र परिवार से संबंधित था एवं पापपूर्ण कार्यों में लिप्त था। 7- यदि लग्न या सप्तम भाव में राहु हो तो व्यक्ति की …